Sunday, January 28, 2018

रतजगे

रतजगे फिर से जगाने लगे
अलसायी आँखों को मनाने लगे
न कोई दौड़ है न कोई होड़
न कोई मंज़िल है न कोई मोड़
बस खुद से खुद की ज़िद्द में
पहियों पर पंख लगाने लगे


फ़ुरसतें तलाशती ये आँखें
खुद के लिए कुछ पल को तरशती  हैं
सपनें, आसमान और उम्मीद
की श्याही से खुद को तराशती हैं
कुछ राहें थी जो छूट गयी
कुछ रास्तें नए नज़र आने लगे 
रतजगे फिर से जगाने लगे
अलसायी आँखों को मनाने लगे

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