Thursday, July 19, 2018

ख़्वाइश

उसने आज तक मुझसे ये नहीं कहा, "स्कूल नहीं जाना!"
पर आज रोते हुए मुझसे बोला, "डैडी, प्लीज स्कूल नहीं जाना!"
मैंने बहाने बनाये, और उसने रोटी हुई सूरत
स्कूल न जाना, उसके लिए तसल्ली थी और मेरे लिए ज़रुरत

वो मेरे पैर से लिपट गया
उसकी दायीं आँख का एक आँसू मेरी टी-शर्ट में अटक गया
एक मन आया की आज रहने दूँ
उसे उसके मन की करने दूँ

अगले ही पल फीस का ख्याल मन में रम गया
मेरी करुणा का ज्वार कर्त्तव्य के भार से थम गया
मैंने एक और बहाना बनाया, "बेटा मेडिसिन लेने जाना है "
आधे अधूरे विश्वास में उसको भी लगा की बस जल्दी से आना है

उसने आँसू पोंछे और मेरा हाथ थाम लिया
जिम्मेदारी बाटँते हुए साथ मेडिसिन लाने का ठान लिया
मैंने जैसे ही बैग की तरफ नज़र बढ़ाई
उसने फिर चिल्ला कर नाराज़गी जताई, "बैग नहीं, बैग नहीं!"

वो काला भारी बैग उसे एक आँख न सुहाता था
उसका हॉल में रखा होना भी उसे बिलकुल न भाता था
बैग से हटाकर मैंने उसकी माँ की तरफ नज़र बढ़ायी
उसकी आँखों में भी बेटे सी ही सिफ़ारिश समायी

ऐसा लगा मानो की एक मैं ही स्वार्थी, कपटी, कठोर हूँ
भविष्य सँवारने के लिए वर्तमान में हृदय से कमज़ोर हूँ
इस से पहले की फिर से मेरा मन पिघलता
दया और ममता का झरना फिर से बह निकलता

मैंने अपना मन पक्का किया और बेटे को समझाया
वापस आकर घुमाने का प्रलोभन भी दिलाया
मूवी, रिमोट कार, आइस क्रीम और न जाने क्या क्या प्रॉमिस किया
पर उसकी भरमाई आँखों ने आज उनमें से किसी को भी मिस नहीं किया

मैंने एक आखिरी बार घडी की तरफ नज़र उठायी
आँख और कान पर व्याभारिकता से पट्टी बँधायी
और वो काला भारी बैग उठा के कंधे पर डाल कर
निकल पड़ा अपने भविष्य की गठरी संभाल कर

न रोते हुई आवाज़ कानों तक आयी, न आंसुओं की फुहार नज़र आयी
न बीवी की शिकायतें, न उसकी अनकही गुज़ारिश
नज़र आया तो बस भीड़ में भागता मैं
मेरे कुछ सपनें और एक अधूरी ख़्वाइश...

Sunday, January 28, 2018

रतजगे

रतजगे फिर से जगाने लगे
अलसायी आँखों को मनाने लगे
न कोई दौड़ है न कोई होड़
न कोई मंज़िल है न कोई मोड़
बस खुद से खुद की ज़िद्द में
पहियों पर पंख लगाने लगे


फ़ुरसतें तलाशती ये आँखें
खुद के लिए कुछ पल को तरशती  हैं
सपनें, आसमान और उम्मीद
की श्याही से खुद को तराशती हैं
कुछ राहें थी जो छूट गयी
कुछ रास्तें नए नज़र आने लगे 
रतजगे फिर से जगाने लगे
अलसायी आँखों को मनाने लगे